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Monday, September 28, 2020

तीन कृषि अधिनियम और किसानो का आंदोलन

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नया कृषि अधिनियम

भारत सरकार 5 जून 2020 को 3 अध्यादेश लेकर आयी। यह अध्यादेश कृषि सुधार से जुड़े हैं जिसमें कृषि विकास और किसानों की आय केंद्रित है। ये अध्यादेश हैं:

1. आवश्यक वस्तुएं ( संशोधन ) आदेश, 2020
2. किसानों का उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) आदेश, 2020
3. किसानों (रोजगार और संरक्षण) मूल्य आश्वासन पर समझौता और कृषि सेवा आदेश, 2020 

हालाँकि ये अध्यादेश संसद के अगले सप्ताह के 6 सप्ताह बाद समाप्त हो सकते थे, इसलिए इसे विधेयक के रूप में  संसद में प्रस्तुत किया गया। दोनों सदनों ने उन्हें पारित कर दिया है और अब वे अधिनियम बन गए हैं। आइए समझते हैं कि ये अधिनियम क्या हैं:

1. आवश्यक वस्तुएं ( संशोधन ) आदेश, 2020:

आवश्यक वस्तु के 1955 के अधिनियम के अनुसार, भारत सरकार कृषि उत्पादों के उत्पादन, आपूर्ति और वितरण के साथ-साथ व्यापार और वाणिज्य को नियंत्रण में ले सकता है जिनकी उपलब्धता और बाजार कीमत में अस्थिर आ जाये। लेकिन नए संशोधन के अनुसार भारत सरकार इसमें निम्नलिखित बदलाव लायी है:
  1. अनाज, दालें, खाद्य तेल, तेल, आलू और प्याज सहित ऐसे खाद्य पदार्थों की आपूर्ति को भारत सरकार द्वारा तभी नियंत्रित किया जा सकता है जब कुछ असाधारण परिस्थितियों जैसे युद्ध, अकाल, प्राकृतिक आपदा और कीमत में उल्लेखनीय वृद्धि आ जाये।
  2. केवल मूल्य वृद्धि के मामले में स्टॉक सीमा को नियंत्रित किया जाएगा और इसके लिए आदेश केवल निम्नलिखित शर्तों के तहत जारी किया जा सकता है
    • यदि जल्दी खराब होने वाले खाद्य पदार्थ जैसे फल एवं सब्जियों की बाजार कीमत 100 प्रतिशत बढ़ जाती है।
    • यदि खाद्य पदार्थों जैसे अनाज और दालें की बाजार कीमत 50 प्रतिशत बढ़ जाती है।
  3. कीमतें स्थिर करने लिए 12 महीने के बाद या 5 साल के औसत कीमत जो भी कम होगी, पर विचार किया जायेगा
  4. भंडारण सीमा को स्थिर करने के लिए कोई भी आदेश प्रोसेसर और मूल्य श्रृंखला प्रतिभागियों पर लागू नहीं होगा यदि उनके कारखानों की भंडारण क्षमता, वस्तु की प्रसंस्करण क्षमता से अधिक नहीं है और निर्यातकों के मामले में अगर भंडारण क्षमता उनके निर्यात की क्षमता से अधिक नहीं है।
  5. सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) या लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (टीपीडीएस) स्टॉक सीमा आदेश के दायरे में नहीं आएगी।

2. किसानों का उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) आदेश, 2020: इस अधिनियम के अनुसार किसानों और व्यापारियों को कृषि उत्पाद बेचने और खरीदने की पूर्ण स्वतंत्रता है। किसान अपनी फसल को राज्य में और राज्य के बाहर कहीं भी बेंच सकते है । वे अपनी कृषि उपज को जिस भी कीमत पर चाहें बेच सकते हैं। इसी तरह व्यापारियों को भी समान लाभ हैं। वे पूरे भारत में किसी के साथ अनुसूचित कृषि उत्पादों (केवल एएमपीसी के तहत बेचा जा सकता है) में व्यापार कर सकते हैं।

नियम

  1. कोई भी व्यापारी भारत के किसी भी राज्य में अनुसूचित कृषि उत्पादों का व्यापार कर सकता है। उसके लिए उसके पास एक स्थायी खाता संख्या (PAN) होनी चाहिए। वह व्यापार को आसान बनाने के लिए एक व्यापारिक क्षेत्र में एक इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग और लेनदेन मंच भी स्थापित कर सकता है लेकिन इन प्लेटफ़ॉर्म को नियमों और दिशानिर्देशों का पालन करना होगा।
  2. यदि व्यापारियों द्वारा इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग के संबंध में कोई अनियमितता की जाती है तो सरकार सख्त कारवाही कर सकती है और कड़े नियम बना सकती है।
  3. किसी भी राज्य सरकार को किसानों, व्यापारी या किसी भी इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग पर किसी भी तरह का शुल्क लगाने का अधिकार नहीं है।
  4. वर्तमान एपीएमसी (APMC) जारी रहेगा और किसी भी राज्य के एपीएमसी अधिनियम और राज्य के अन्य कानून को फिलहाल लागू किया जाएगा।

विवाद का समाधान

  1. किसान और व्यापारी के बीच किसी भी विवाद के मामले में, वे एसडीएम (SDM) को एक आवेदन दायर करके समाधान की गुज़ारिश कर सकते हैं। वह उनके मामले को समझौता समिति (Conciliation Board) को भेजेंगे।
  2. समझौता समिति में एक अध्यक्ष और सदस्य दो से कम नहीं और चार से अधिक नहीं होंगे।
  3. यदि दोनों पक्ष तीस दिनों के भीतर अपने विवाद को हल करने में असमर्थ हैं, तो वे उप-विभागीय मजिस्ट्रेट (SDM) से संपर्क कर सकते हैं जो प्रावधानों के किसी भी उल्लंघन का संज्ञान लेकर कार्रवाई करने और विवाद को निपटाने के आदेश देगा।
  4. कोई भी पक्ष इस मामले में दीवानी अदालत का दरवाजा नहीं खटखटा सकता है और अनुविभागीय प्राधिकरण (Sub-Divisional Authority) के सभी आदेश दीवानी न्यायालय के समान होंगे।
  5. कोई भी व्यक्ति जो किसी आदेश से संतुष्ट नहीं है, वह 60 दिनों के भीतर अधिकारी से संपर्क करेगा जो की भारत सरकार के संयुक्त सचिव के पद से नीचे के पद का न हो यदि वह ऐसा करने में असक्षम होता है तो उसे 90 दिनों में भी अदिकारी से संपर्क कर सकता है पर उसे इस मामले में देरी का कारण बताना होगा।

जुर्माना

  1. यदि कोई पक्ष प्रावधानों का उल्लंघन करता है, तो वह 25000 / - कम से काम रुपये के दंड का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी होगा जो कि 5,00,000 / - रुपये तक बढ़ सकता है। यदि किसी भी पक्ष ने उल्लंघन जारी रखा, तो जुर्माना प्रत्येक दिन के लिए 5,000/-  रुपये लगाया जा सकता है।
  2. यदि कोई व्यक्ति जो इलेक्ट्रॉनिक्स ट्रेडिंग और लेनदेन प्लेटफॉर्म का मालिक है, उसे नियंत्रित करता है या संचालित करता है, और  धारा 5 और 7 के प्रावधान का उल्लंघन करता है तो दंड का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी होगा जो की काम से काम 5,000 /- और अधिकतम 10 लाख तक हो सकता है।

3. किसानों (रोजगार और संरक्षण) मूल्य आश्वासन पर समझौता और कृषि सेवा आदेश, 2020: इस बिल के माध्यम से किसानों को कृषि व्यावसायिक फर्मों, प्रोसेसर, थोक विक्रेताओं, निर्यातकों और बड़े खुदरा विक्रेताओं के साथ अपने कृषि उपज को लाभदायक मुनाफे के लिए औपचारिक समझौता (Formal Agreement) करने की अनुमति है। पहले अनुबंध खेती (Contract Farming)के लिए कोई प्रावधान नहीं था और इसके कारण बड़ी कंपनियां खेत क्षेत्र में निवेश नहीं कर सकती थीं लेकिन इस अधिनियम के माध्यम से बड़े व्यावसायिक संघ अब ऐसा कर सकती हैं।

नियम

  1. किसान किसी भी व्यावसायिक संघ के साथ अपनी कृषि उत्पादन के लिए सप्लाई, उत्पादन की गुणवत्ता, कीमत और कृषि सेवाएं(कृषि सेवांए वह होती है जिसमे बीज खाद, कीटनाशक और खेती की मशीनें मुहैया कराइ जाती है) का  समझौता कर सकता है।
  2. कृषि-व्यवसाय कंपनियों, प्रोसेसर या किसी भी बड़े खुदरा विक्रेताओं के अधिकारों का शोषण नहीं किया जाएगा।
  3. समझौते की न्यूनतम अवधि एक फसल का मौसम और अधिकतम अवधि पांच साल हो सकती है।
  4. केंद्रीय सरकार किसानों को समझौते में प्रवेश करने के लिए दिशानिर्देश और मॉडल कृषि समझौता प्रदान कर सकती है।
  5. खेत की उपज की कीमत समझौते में उल्लिखित की जाएगी और अगर कीमत कृषि उपज की प्रक्रिया के दौरान बदलती है तो एक गारंटी मूल्य + अतिरिक्त राशि किसान को दी जाएगी, बशर्ते कि गारंटीकृत कीमत और अतिरिक्त राशि खोजने का एक तरीका अनुबद्ध किया जाएगा। 
  6. प्रायोजक बीज उत्पादन के मामले में, डिलीवरी के समय स्वीकृत राशि का दो-तिहाई भुगतान करेगा और शेष राशि उचित प्रमाणीकरण के बाद, लेकिन डिलीवरी के तीस दिनों के भीतर करेगा और अन्य उत्पादन के मामले डिलीवरी के तुरंत बाद करेगा।
  7. राज्य सरकार भुगतान के लिए मोड और तरीके को परिभाषित कर सकती है।
  8. यदि कोई कृषि उत्पाद राज्य अधिनियम के अंतर्गत आता है और उसे इस अधिनियम के समझौते के तहत लाया जाता है तो उसे राज्य अधिनियम से बाहर रखा जायेगा और समझौते की अवधि के दौरान इस अधिनियम के तहत बरकरार रहेगा।
  9. यदि कोई कृषि उपज आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 या जारी किए गए किसी भी नियंत्रण आदेश या किसी अन्य कानून में लागू होता है, तो यह इस अधिनियम के किसी भी समझौते के तहत किसान द्वारा उत्पादित किए जाने वाले किसी भी उत्पादन पर लागु नहीं होगा।
  10. समझौते में किसानों की भूमि को किसी भी हस्तांतरण, बिक्री, पट्टे या बंधक के अधीन नहीं किया जाएगा। यहां तक कि अगर प्रायोजक किसान की भूमि पर कोई अस्थायी या स्थायी निर्माण करता है, तो वह उसे अपने खर्च पर निकालने के लिए बाध्य होगा। वह इस निर्माण को ऐसा ही छोड़ भी सकता है अगर किसान सहमत हो।

विवाद का समाधान

इसके नियम किसानों के उत्पाद व्यापार और वाणिज्य अधिनियम 2020 के समान हैं।

किसानों की चिंताएं


पूरे भारत में किसान इन अधिनियम के संबंध में विरोध कर रहे हैं। उन्हें कॉरपोरेट्स के हाथों शोषण होने का डर है। प्रत्येक अधिनियम के लिए उनकी चिंताए निम्नलिखित है:

1. आवश्यक वस्तुएं ( संशोधन ) आदेश, 2020
  • किसानों के पास भंडारण की सुविधा नहीं है, इसलिए उन्हें अपनी उपज जल्द से जल्द बेचनी होगी।
  • यह अधिनियम जमाखोरी को प्रोत्साहित करेगा। यह कृषि उपज जमा करने के लिए व्यापारी दलों को खुली छूट देगा जिससे न केवल उत्पादन की कीमत की मार्किट में वृद्धि होगी, बल्कि इससे ब्लैक मार्केटिंग भी होगी।
  • किसान न केवल उत्पादक हैं बल्कि वे उपभोक्ता भी हैं। इसलिए वे मूल्य वृद्धि से बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं।
  • व्यापारी दल मूल्य के साथ अपनी मर्ज़ी से छेडछाड कर सकते है। इसे कम कर सकते हैं जब उन्हें किसानों से इसे खरीदना होगा और बढ़ा सकते है जब वह इसे बाजार में उपभोक्ता को बेचेंगे। प्याज के निर्यात पर हालिया प्रतिबंध इसके बारे में संदेह पैदा करता है।

2. किसानों का उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) आदेश, 2020:
  • चूंकि छोटे किसान अपनी मुख्य भूमि से बहुत दूर नहीं जा सकते थे, इसलिए वे अपनी उपज को स्थानीय स्तर पर बेचने के अलावा कुछ नहीं कर सकते।
  • एमएसपी (MSP)एक और चिंता का विषय है। सरकार ने विधेयक में इसका आश्वासन नहीं दिया। किसान चिंतित हैं कि भविष्य में इसे समाप्त किया जा सकता है।
  • एमएसपी के बिना उन्हें अपने उत्पाद को अपने आसपास के क्षेत्र में उपलब्ध मूल्य पर ही बेचना होगा।
  • खुले बाजार में एपीएमसी (APMC) धीरे धीरे विघटित हो जायेगी और फिर कॉर्पोरेट बाजार को हतिया कर उत्पादन की कीमतों के साथ मनमर्ज़ी खिलवाड़ करेंगे।

3. किसानों (रोजगार और संरक्षण) मूल्य आश्वासन पर समझौता और कृषि सेवा आदेश, 2020:
  • किसान विशेष रूप से छोटे किसान कानूनी प्रक्रिया का ध्यान नहीं रख सकते थे और कॉर्पोरेट इससे उनका शोषण कर सकते है।

विशेषज्ञ की राय

  
 
विशेषज्ञों के मिश्रित विचार हैं। जबकि कुछ विशेषज्ञ और प्रोफेसर आर.एस. देशपांडे, जो सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन संस्थान के पूर्व निदेशक हैं, उनमें से एक हैं, इन बिलों का समर्थन करते हैं और तर्क देते हैं कि खुले बाजार में प्रतिस्पर्धा का माहौल होगा और किसानों की आय बढ़ाने में उनका समर्थन करेंगे।
    जबकि कुछ विशेषज्ञ जिनमे से पी साईनाथ  एक है, ने एतराज जताया है और कहते है कि यह किसानों को बर्बाद कर देगा। उनका तर्क है कि मुख्य रूप से एक आदिवासी क्षेत्र का एक बहुत छोटा किसान जो मुश्किल से 2 से 3 बोरी कृषि उपज पैदा करता है वह इस खुले बाजार में जीवित नहीं रह सकता है। यहां तक कि वह अपने खेत की उपज का एमएसपी भी नहीं प्राप्त कर सकता। वे एपीएमसी (APMC) के संशोधन के पक्ष में हैं और किसान के लिए एक अच्छी भंडारण सुविधा चाहते हैं ताकि वे फसल की बेहतर कीमत के लिए अपने खेत की उपज को स्टोर कर सकें। वे बिहार का उदाहरण देते हैं जहां एपीएमसी मौजूद नहीं है और प्रतिस्पर्धी बाजार हैं, लेकिन किसानों को अभी भी पंजाब और हरियाणा की तुलना में जहां एपीएमसी मौजूद है, उनकी फसलों के लिए बहुत कम कीमत मिलती है।

    कई किसान यूनियन नए अधिनियम और संशोधन का समर्थन करते हैं, जबकि उनमें से अधिकांश अखिल भारतीय किसान संघर्ष (एआईकेएस) और भारतीय किसान संघ (बीकेएस), जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हैं, एमएसपी को जोड़ने के लिए एक खंड की मांग कर रहे हैं जो किसानों को मूल आय का आश्वासन देता है। 

कांग्रेस और कुछ विपक्षी दलों का रुख

   
पूरे जोरों से इसका विरोध कर रहे है और मांग कर रहे है  या तो अधिनियम को वापस लिया जाये अन्यथा एमएसपी (MSP) को इन अधिनियम में जोड़ा जाये। उसी के लिए वे राज्यसभा का बहिष्कार कर रहे हैं और 25 सितंबर को भारत बंद का भी समर्थन किया।

आरोप

    सरकार का तर्क है कि आंदोलन केवल पंजाब और हरियाणा में हो रहे है क्योंकि इन राज्यों में आरती की संख्या बहुत बड़ी है। वे कमीशन एजेंट हैं। केवल वे विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं क्योंकि उनका अस्तित्व दांव पर है।

समाधान

3 अधिनियम के खिलाफ पूरे विरोध को रोका जा सकता है यदि सरकार नए कृत्यों में केवल एक संशोधन लाती है जो एमएसपी को खरीदने के लिए अनिवार्य बनाती है। लेकिन यह अब सरकार पर निर्भर करता है कि  वो  नाराज किसानों को कैसे मनाती है।


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